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90 नहीं 250 साल पुराना है कोसी महासेतु का इतिहास , हो गया है बनके पूरा तैयार

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बिहार में कोसी नदी के ऊपर 2 किलोमीटर लंबा पुल कोसी महासेतु लगभग बनकर तैयार हो गया है। इस बात की जानकारी भारत के रेल मंत्री पीयूष गोयल ने अपनी ट्वीट में कहा था। उन्होंने लिखा की बिहार वासियों का 90 वर्ष पुराना सपना अब साकार हुआ। मिथिलांचल को कोशी से जोड़ने वाला पुल कोसी महासेतु बनकर तैयार हो गया है।

imagesource-google\image bywikepedia

कोसी महासेतु का इतिहास

  • हम अपने पाठकों को यह बात पहले बता दे कि कोसी महासेतु का इतिहास बहुत पुराना है।
  • इस महासेतु को सबसे पहले ब्रिटिश शासन के दौरान 1887 ईसवी में बनाया गया था। यह ब्रिज उस दौरान निर्मली स्टेशन से सरायगढ़ स्टेशन को आपस में जोड़ता था।
  • परंतु 1934 में आए भूकंप के दौरान यह ब्रिज बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गया था और फिर 90 सालों तक इसे नहीं बनाया गया।
  • आप सरकार के कामकाज और उसकी व्यवस्था का अनुमान सिर्फ इसी बात से लगा सकते हैं 1934 में क्षतिग्रस्त हुआ पुल आज 2020 में बनकर तैयार हुआ है।
  • क्योंकि कोशी नदी का बहाव लगातार बदलता जा रहा है जिसके कारण सरकारों को भी कई तरह कि मुसीबतों का सामना करना पड़ा है।

इस ब्रिज का शिलान्यास 2003 में उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेई जी के द्वारा किया गया था और अब जाकर 20 साल बाद यह भेज पूरी तरह से बनकर तैयार हो गया है।

इस ब्रिज की विशेषताएं

  • यह ब्रिज 1.88 किलोमीटर लंबी है और इसमें कुल 39 स्पेन है।
  • इस ब्रिज का कूल बजट 561 करोड़ रुपए हुआ है किन्तु जब 2003 में इस ब्रिज की नींव रखी गई थी, उस समय इसका बजट 361 करोड रुपए निर्धारित किया गया था।
  • प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई जी ने इस ब्रिज का शिलान्यास किया था।
  • यह ब्रिज उत्तर बिहार को उत्तर पूर्वी भारत से जोड़ देगा जोकि रेलवे के लिए  बहुत ही महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
  • यह ब्रिज भविष्य को ध्यान में रखकर बनाया गया है और इस पर मालगाड़ी और सवारी गाड़ी दोनों ही ट्रेनों का आवागमन हो सकता है।
  • इस ब्रिज के ऊपर रेलवे का भी ट्रायल हो गया है और इस मार्ग के ऊपर सवारी गाड़ी तथा माल गाड़ी दोनों को चला के इसके सुरक्षा जांच भी की गई जो की काफी संतुष्ट करने लायक था।
  • फिलहाल अभी उत्तर भारत से उत्तर पूर्वी भारत जाने के लिए ट्रेनों को काफी लंबी दूरी तय करनी होती है।
  • अभी यह ट्रेनें उत्तर भारत से मध्य बिहार के रास्ते कटिहार होते हुए उत्तर पूर्वी भारत की तरफ जाती है, इस ब्रिज का तैयार होने से ना तो सिर्फ ट्रेनों को लंबी दूरी से मुक्ति मिलेगी साथ के साथ ईंधन और समय की भी काफी बचत होगी।


बिहार के लिए इस पुल का महत्व

  • उत्तरी बिहार के इलाके कोसी और मिथिलांचल जो कोशी नदी के कारण दो हिस्सों में बट रहे थे वह अब फिर से इस ब्रिज के बनने के कारण जुड़ जाएंगे।
  • उत्तरी बिहार में रेलवे विकास को बढ़ावा मिलेगा जिसके कारण औद्योगिक गतिविधियों को भी फायदा मिलेगा
  • नदी के कारण बिहार को हर साल भयंकर बाढ़ का सामना करना पड़ता है जिसके कारण बिहार में औद्योगिक गतिविधियां बहुत ही कम है या ना के बराबर है।औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए हमें विकास का एक ऐसा मजबूत ढांचा प्रधान करना होगा जो बाढ़,भूकंप, अथवा किसी भी प्राकृतिक आपदा से निपटने के लिए परिपूर्ण हो।
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