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कला उत्पत्ति एवं उसका वर्गीकरण

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साढ़े चार अरब करोड़ साल पहले पृथ्वी आग के गोले के सामान थी । जिसमें जीवों का  उद्भव लगभग 2.5  अरब करोड़ साल पहले प्रारंभ हुआ । पृथ्वी पर अनगिनत जीव  आदिम काल से ही वास करते आ रहे हैं । उन्ही जीवों में ‘ऐप’ का परवर्तित स्वरुप ‘होमो सैपियन्स सैपियन्स’ का भी यह  पृथ्वी निवास स्थान रही हैं । मानव (होमो सैपियन्स सैपियन्स)  ने अपने चिंतनशील स्वभाव के कारण लगभग सभी प्रजातियों को अपने अधीन कर लिया ।  परन्तु जहां एक ओर  इसकी विश्व विजय की चाह ने पृथ्वी के अंतिम छोर तक  इसे पहुचायां, वही दूसरी  ओर आंतरिक खोज ने कला को जन्म दिया । ‘कला’ शब्द  अपने आप में एक ग्रन्थ के समतुल्य हैं । जो सुनने में तो छोटा सा शब्द हैं, परन्तु इसका अर्थ अत्यंत व्यापक एवं बहुआयामी हैं  । कला एक प्रकार का शस्त्र हैं, जिसका प्रयोग मानव जाती अपने भावों के प्रस्तुति करने के लिए प्रयोग में लाती हैं ।

कला उत्पत्ति

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 कला शब्द की उत्पत्ति संस्कृत भाषा के ‘कल’ धातु से मानी जाती हैं, जिसका अर्थ संख्यान (स्पष्ट वाणी में प्रगट करना) से हैं । कला के लिए अंग्रेजी भाषा में ‘आर्ट’(ART)  शब्द का प्रयोग किया जाता हैं, जो 13वीं  शताब्दी के पश्चात से प्रचलन में आया । ‘आर्ट’ लैटिन भाषा के ‘आर्स’ (ARS) से निकला हैं, जिसका अर्थ ‘कौशल’ माना जाता हैं । 

प्राचीन मान्यता में कला के लिए प्रायः ‘शिल्प’ शब्द का प्रयोग किया जाता था । शतपत ब्राह्मण के अनुसार जो “कुछ भी देव शिल्पों का प्रतिरूप हैं, वही शिल्प हैं”। नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने शिल्प शब्द को  सर्वप्रथम विभक्त कर कला एवं शिल्प दोनों का अलग प्रयोग किया  । हालांकी यह एकमात्र ऐसा ग्रन्थ नहीं हैं, जो कला का वर्णन करता हैं ।  ‘वात्सायन’ ने जहाँ ‘कामसूत्र’ में 64 प्रकार की कलाओं का वर्णन किया हैं, वही ‘क्षेमेन्द्र’ ने अपनी पुस्तक ‘कलाविलास’ में 64 जन उपयोगी, 32 पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) संबंधी, 64 सोनारो, 64 वेश्याओं,10 चिकित्सक,16 कायस्थों तथा 100 सार कलाओं का वर्णन किया हैं ।  इन समस्त ग्रंथो में  विद्वानों का ‘कला’ से तात्पर्य किसी भी कार्य क्षेत्र में कुशलता से हैं । यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने जहाँ एक ओर कला को सत्य की अनुकृति माना हैं,  वही रविन्द्रनाथ टैगोर के  अनुसार “कला सत हैं और जो सत हैं वही सुन्दर हैं”।

कला का वर्गीकरण

मानव समाज में जिस प्रकार भिन्नता आती गई, उसी प्रकार कला में भी वर्गीकरण होता गया । प्राचीन भारत में प्रकृति को देव शिल्प एवं प्रकृति के उपयोग से मानव द्वारा निर्मित वस्तु को  मानव शिल्प अर्थात कला के रूप में विभक्त किया गया ।

जहाँ  देव शिल्प में पहाड़, जल, पेड़ पौधो एवं उनमें मानव के हस्तक्षेप के आभाव में बनी सुन्दर आकृतियाँ की गणना की जाती हैं । तो दूसरी ओर मानव द्वारा निर्मित कला को दो भाग ललित कला (Fine Art)  एवं उपयोगी  कला( Craft)  में  विभक्त किया हैं । ललित कलाओं को ही प्रमुख कला के रूप में  माना जाता हैं  । संगीत, काव्य, चित्र, मूर्ति तथा स्थापत्य इत्यादि को ललित कला की श्रेणी में रखा जाता हैं । प्राचीन यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने कला को इनके उद्देश्यों के आधार पर आचरण विषयक कला, ललित कला एवं उदार कला तीन प्रमुख  भागों में विभक्त किया । जबकि  ‘हीगल ने अपने ‘हिगेलियम क्लासिफिकेशन ऑफ़ फ़ाईन आर्ट’ में इसको ‘दृश्य’ अथवा ‘श्रव्य’ में वर्गीकृत किया हैं,जिसमें उन्होंने काव्य को श्रेष्ठ मान है ।

 अर्थात सरल भाषा में हम कला को  मुख्यतः ‘मूर्त कला’  एवं  ‘अमूर्त कला’ दो भागो में विभक्त कर देख सकते है।‘मूर्त कला’ अर्थात वह कला  जिन्हें हम सामान्यतः देख एवं स्पर्श कर सकते हैं, चित्र कला, मूर्तिकला, शिल्पकला  एवं स्थापत्यकला  यह इसके प्रमुख आयाम हैं । ‘अमूर्त कला’ में हम मुख्यतः उन कलाओं की गणना करते हैं, जिसको हम स्पर्श  नहीं कर सकते परन्तु उनके  सौन्दर्यानुभूति अवश्य कर सकते हैं । इसमें संगीत, नृत्य, एवं रंगमंच प्रमुख हैं । इन दोनो कलाओं के अतिरिक्त साहित्य एवं धर्म दर्शन को भी कला के अंतर्गत ही रखा  जाता हैं ।

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